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मूलाधार चक्र की शक्ति।

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मूलाधार चक्र की शक्ति-- परमेश्वर ने हमारे शरीर की रचना करते समय कुल सात चक्रों को हमारे शरीर में स्थापित किया है, ये स्रष्टि की समस्त शक्तियों का केंद्र माने जाते हैं। इनमें सबसे पहला चक्र मूलाधार चक्र है। परमात्मा ने हर जीव को सुप्त मूलाधार चक्र की ऊर्जायें जन्म से ही प्रदान की हैं। एक साधारण स्वस्थ मनुष्य में कुंडलिनी ऊर्जा इसी मूलाधार चक्र ( जो रीढ़ की हड्डी में गुदा और शिश्न के ठीक बीच स्थित होता है) के भीतर साँप की तीन कुंडली मारे सुप्त पड़ी रहती है। मूलाधार चक्र ही जीवन की समस्त कामनाओं, वासनाओं, भौतिक सुखों, भावनाओं व मानसिक स्थायित्व का केंद्र है। यही चक्र सभी नकारात्मक आयामों (काम,क्रोध,मोह,लोभ,मद,मात्सर्य) का केंद्र बिंन्दु भी है। मूलाधार चक्र की ऊर्जाओं को कोई भी व्यक्ति महसूस कर सकता है। कामवासना की सर्वोच्च अवस्था में अर्थात 'स्खलन' की स्थिति में इस कुंडली मारे सुप्त ऊर्जा में थोड़ी हलचल होती है, यदि इस समय आप ध्यान दें तो आनन्द की तरंगों का केन्द्र आपके गुदा और शिश्न के बीच के भाग से ही आता है। यदि इस क्षण आप किसी फुटबाल या गेंद पर बैठ जाते हैं तो आप देख...

आस्तिक और नास्तिक में कौन बेहतर।

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आस्तिक और नास्तिक में कौन बेहतर है। भगवान के अस्तित्व पर हमेशा से संदेह वना रहा है, कोई यह स्पष्ट रुप से  नहीं कह सकता कि भगवान हैं या नहीं। लेकिन इतना तो तय है कि आध्यात्मिक जगत में आपका विश्वास ही आपका सबकुछ होता है। इसमें सबसे ज्यादा खराब स्थिति बीच वालों की होती है जिनके मन में संदेह रहता है कि भगवान हैं या नहीं हैं। तभी तो कहा गया है कि एक सच्चा नास्तिक ही सच्चा आस्तिक होता है। और सच्चा आस्तिक तो आस्तिक है ही। इस बारे में आपको एक घटना को बताता हूँ-- एक बार गोतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ सभा कर रहे थे, तभी एक भगवा कपड़ा पहने एक व्यक्ति पेड़ के पीछे खड़ा होकर उन्हें देख रहा था। यह व्यक्ति बहुत ही धार्मिक स्वभाव का था, इसने अपना पुर्ण जीवन भगवान को समर्पित कर दिया था। उसने स्वयं कई मन्दिरों का निर्माण करवाया था, किन्तु मन में भय था कि अगर भगवान हैं ही नहीं तब तो उसका पूरा जीवन ही व्यर्थ हो गया। इस बात की पुष्टि के लिये उसने आत्मज्ञानी बुद्ध से पूछा- हे बुद्ध क्या भगवान होते हैं। बुद्ध थोड़ी देर तक उसे देखे फिर मुस्कुरा कर उत्तर दिया, नहीं भगवान जैसी कोई चीज नहीं ह...

कुंडलिनी शक्ति जागरण क्यों है प्राणघाती।

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कुंडलिनी शक्ति जागरण क्यों है प्राणघाती। दोस्तों हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हम स्वयं को जानते ही नहीं। जब हम मन्दिर, गुरुद्वारा,चर्च या मस्जिद जाते हैं तो हम भगवान को सदैव अपने से अलग और श्रेष्ठ मानकर उनकी आराधना करते हैं, हम कभी इस बात पर गौर ही नहीं करते कि भगवान हमसे अलग नहीं है, हमारा उसके साथ सदियों से अटूट रिश्ता रहा है, यह रिश्ता उतना गहरा है जितना हमारे सांसारिक रिश्ते भी नहीं हैं। हम अनंत काल से जबसे स्रष्टि का स्रजन हुआ है उसके अंश हैं और वो ही हमारा सच्चा मालिक। अब आप उसे चाहे जिस रुप में पूजें पिता, माता, गुरु, या सर्वस्व मानकर, आप 100 प्रतिशत उसके ही अंश हैं अर्थात आप भी भगवान हैं, क्योंकि पानी की बूँद पानी होती है और तेल की बूँद तेल ही होती है। किन्तु आप में वो योग्यता और ज्ञान नहीं है लेकिन ईश्वरीय शक्ति आप के भीतर ही वास करती है। जैसे एक पास या एक फेल बालक में केवल मेहनत का ही अन्तर होता है लेकिन बालक तो दोनों ही हैं न, किसी ने समय का सदुपयोग करके अपने को सफल बना लिया तो कोई असफल ही रह गया, बस। केवल इतना ही फर्क एक साधारण और एक महामानव में होता है, ईश्वर...

साधो सहज समाधि भली।

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                साधो सहज समाधि भली वर्तमान समय में सारा विश्व इस भागदौड भरी जिंदगी में परेशान है। आराम करने का वक्त ही नहीं है। तनाव इतना ज्यादा है कि अगर दो क्षण के लिये आँख लग भी जाती है तो सपने में काम की ही याद आती है, इसलिये नींद की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं है और जागने के बाद फिर से काम। काम-काम और बस काम। क्या कोई ऐसी टेक्निक है जिसे करके हम अपनी इस छोटी सी नींद को बेहतर बना सकते हैं, जिससे कम से कम शरीर के साथ-साथ मन को भी आराम मिले और हम अनेक मानसिक बीमारियों जैसे तनाव, अवसाद इन सबसे बच सकें और एक संतुलित जीवन जी सकें। हाँ एक तरीका है, लेकिन इसके लिये आपको अपने जीवन का केवल आधा घंटा प्रतिदिन देना होगा। केवल थोडे से प्रयास से आप देखेंगे कि आपके  अन्दर एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा है, और इस ऊर्जा का प्रभाव आपको दिन भर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में देखने को मिलेगा। वो तरीका है बस एक छोटा सा ध्यान। नींद अचेत ध्यान है, और ध्यान सचेत नींद। यह पूरा संसार विश्व शक्ति से जुडा हुआ है। यह शक्ति ही किसी भी जीव का अस्तित्व है, जब हम सोते ...

क्या कुंडलिनी जागरण नास्तिकता का प्रतीक है।

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क्या कुंडली जागरण नास्तिकता का प्रतीक है- कुंडलिनी शक्ति को परमात्मा ने मनुष्य के सवसे नीचे के मूलाधार चक्र में प्रदान किया है, जोकि काम-वासना, मानसिक रूप से स्थायित्व, भावनाएं व इंद्रिय सुख से संबंधित है। जब मनुष्य ध्यान द्वारा कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने का प्रयास करता है तो सर्वप्रथम मूलाधार चक्र जाग्रत होता है। इस स्थिति में यह खतरा बना होता है कि मनुष्य कामी हो जाए और इन्द्रिय सुख प्राप्ति में ही अपना जीवन व्यतीत कर दे। इसीलिए कुझ विद्वान यह मानते हैं कि कुंडलिनी शक्ति को साधने वाले व्यक्ति आस्तिक और सात्विक नहीं रह जाता, वह परमात्मा की बराबरी करने लगता है व केवल अपने एक चक्र मूलाधार के जागरण से ही मिली शक्तियों का दुरुपयोग करके नास्तिक बन जाता है। यह बात एक हद तक सत्य है। इसीलिये ही तो परमात्मा ने इस शक्ति को सबसे निचले मूलाधार चक्र में स्थापित किया है ताकि यदि कोई मनुष्य कुंडलिनी जगरण की यात्रा शुरु करता है तो पहले उसका यह चक्र जो सभी तरह के विकारो से संबंधित है, इसका जागरण पहले हो ताकि आगे बढने से पहले ही जो कमजोर साधक हैं वो अपने मार्ग से भ्रष्ट हो जायें। कु...

Brahma,Vishnu,Mahesh me sabse shaktishali kaun?

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      Brahma, Vishnu, Mahesh  me    sabse  shaktishali kaun? Sanatan dharm me teen mukhya devtaon ka varnan hai. Lord Brahma The Creator , Lord Vishnu The defender , and Lord Shiva The distroyer . Per inme se sabse bda aur shaktishali kaun hai? Inka aaps me kya relation hain. Humare kai nam hote hain jaise gher ka nam alag aur school or office ka nam alag. Humko gher me office ka nam sunkar atpta lagta hai to office me gher ka nam sunkar. Office me hum kai aise karya nahi kar sakte jo hum gher me karte hain jaise simple kapdo me rahna, nange paav rahna bina makeup ke rahna etc. yahi bat gher per rahne per bhi apply hoti hai, jaise hum gher per har samay jute ya sandil nahi pahan sakte, gher me hum simple v aramdayak kapde pahnte hain, makeup ki jyada perwah nahi karte. Girlfriend se masti se bat kar sakte hain. To yahan aap dekh rahe hain ki ek simple person, jeevan ke kai aayamo ko ek sath jee rha hai. Wo office ya society me kuch aur hai a...